कुछ यादें, कुछ सपने

झंकृत हो रही अंतर्वीणा, फिर क्यों यह कंठ अवरुद्ध है ?
नव संकल्प का उल्लास है, पर फिर भी मन क्यों क्षुब्ध है ?
आज बुहारा जब यादों का आँगन, कुछ स्वप्न उनमे भी पड़े थे |
कैसे तोड़ दूँ  उस सूत्र को, जिसको पकड़ हम तुमसे जुड़े थे |

दिन कई गुजरे बरसातों में, आज कितने दिनों में यह धुप खिली है |
सूख रहा है हर घर-आँगन, जाने क्यों बस आँखें गीली है ?
मन फिर चढ़ रहा उन्ही किरणों पर, जिनको पकड़ पहले चढ़े थे |
तुम दिख रहे धुंधले से बादलों में, क्या इन्हें ही पकड़ मेरे सपने उड़े थे ?

मैं ठहरा चलने का आदी, क्योंकर तुम मेरा साथ दोगे ?
पर कहीं मन में यह विश्वास है, गिरने पर तुम मुझे हाथ दोगे |
पहले भी तो उन अंधेरों में, कहो रोशनी लिए तुम ही तो खड़े थे ?
मैं चूम रहा हूँ उस दोराहे को बार-बार,  जिससे हम इस डगर को मुड़े थे |

1 टिप्पणी »

  1. अच्छी कविता !


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