कलेजे के तवे पर रखकर, मैं अरमानों को भुनता हूँ ।
मैं स्वप्न बुनता हूँ ।
कभी यूँ ही अकेले में बैठे-बैठे, एक झपकी सी आ जाती है,
मैं गोद में सर रखकर सो जाता हूँ, माँ बालों को सहलाती है ।
दीदी आई है दौड़ी-दौड़ी, मैने उसका घरौंदा तोड़ दिया,
अबकी तो डाँट मिलेगी ही बच्चू, पहले बहुत तुम्हें छोड़ दिया ।
मैं चुप-चाप आँखें बन्द किये, उसकी शिकायतें सुनता हूँ ।
मैं स्वप्न बुनता हूँ ।
आज दिन जाने क्यों इतना खुश है, हर तरफ़ आज दीवली है,
कैसे मैं अपनी खुशी रोकूँ, वो मुझसे मिलने आने वाली है ।
जाने क्या आज मैं कर डालूँ, वो देखकर खुश हो जाये,
उसके सारे गम मेरे हो जाएं, वो सुन्दर सपनों में खो जाये ।
उसके बारे में सोच-सोचकर, जाने क्या मैं घुनता हूँ ।
मैं स्वप्न बुनता हूँ ।
कुछ फ़टा है कान के नीचे शायद, झपकी टूट गयी है झन्नाटे से,
कुछ दिखता नहीं उजाले में भी, कुछ गूँज रहा सन्नाटे से ।
ये शहर नहीं है सपनों का, अरमान यहां पर जलते हैं,
माँ हो गयी है आँखों से ओझल, भावनाओं को पैर कुचलते हैं ।
चकनाचूर हो गये हैं सभी सपने, मैं खाक चुनता हूँ ।
क्यों मैं स्वप्न बुनता हूँ ?
Hitesh Said:
on फ़रवरी 4, 2009 at 11:00 पूर्वाह्न
really good one.
keep writing
i have all the posts on this page are good.
that “char pai” is also good.
regards