मैं स्वप्न बुनता हूँ

कलेजे के तवे पर रखकर, मैं अरमानों को भुनता हूँ ।

मैं स्वप्न बुनता हूँ ।

कभी यूँ ही अकेले में बैठे-बैठे, एक झपकी सी आ जाती है,

मैं गोद में सर रखकर सो जाता हूँ, माँ बालों को सहलाती है ।

दीदी आई है दौड़ी-दौड़ी, मैने उसका घरौंदा तोड़ दिया,

अबकी तो डाँट मिलेगी ही बच्चू, पहले बहुत तुम्हें छोड़ दिया ।

मैं चुप-चाप आँखें बन्द किये, उसकी शिकायतें सुनता हूँ ।

मैं स्वप्न बुनता हूँ ।

 

आज दिन जाने क्यों इतना खुश है, हर तरफ़ आज दीवली है,

कैसे मैं अपनी खुशी रोकूँ, वो मुझसे मिलने आने वाली है ।

जाने क्या आज मैं कर डालूँ, वो देखकर खुश हो जाये,

उसके सारे गम मेरे हो जाएं, वो सुन्दर सपनों में खो जाये ।

उसके बारे में सोच-सोचकर, जाने क्या मैं घुनता हूँ ।

मैं स्वप्न बुनता हूँ ।

 

कुछ फ़टा है कान के नीचे शायद, झपकी टूट गयी है झन्नाटे से,

कुछ दिखता नहीं उजाले में भी, कुछ गूँज रहा सन्नाटे से ।

ये शहर नहीं है सपनों का, अरमान यहां पर जलते हैं,

माँ हो गयी है आँखों से ओझल, भावनाओं को पैर कुचलते हैं ।

चकनाचूर हो गये हैं सभी सपने, मैं खाक चुनता हूँ ।

क्यों मैं स्वप्न बुनता हूँ ?

1 टिप्पणी »

  1. Hitesh Said:

    really good one.

    keep writing

    i have all the posts on this page are good.
    that “char pai” is also good.

    regards


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