Archive for फ़रवरी, 2009

समय

प्यार इन आँखों से,
प्यार इन साँसों से,
प्यार इन भावनाओं से,
प्यार इन कविताओं से |

तरस इन आँखों पर,
तरस इन साँसों पर,
तरस इन भावनाओं पर,
तरस इन कविताओं पर |

नफ़रत इन आँखों से,
नफ़रत इन साँसों से,
नफ़रत इन भावनाओं से,
नफ़रत इन कविताओं से |

आँखें हैं, साँसें हैं,
भावनायें हैं, कवितायें हैं |
मैं हूँ, तुम हो,
यह समय है और जीवन है |

- वैतालिक प्रथम अंक में प्रकाशित

मैं स्वप्न बुनता हूँ

कलेजे के तवे पर रखकर, मैं अरमानों को भुनता हूँ ।

मैं स्वप्न बुनता हूँ ।

कभी यूँ ही अकेले में बैठे-बैठे, एक झपकी सी आ जाती है,

मैं गोद में सर रखकर सो जाता हूँ, माँ बालों को सहलाती है ।

दीदी आई है दौड़ी-दौड़ी, मैने उसका घरौंदा तोड़ दिया,

अबकी तो डाँट मिलेगी ही बच्चू, पहले बहुत तुम्हें छोड़ दिया ।

मैं चुप-चाप आँखें बन्द किये, उसकी शिकायतें सुनता हूँ ।

मैं स्वप्न बुनता हूँ ।

 

आज दिन जाने क्यों इतना खुश है, हर तरफ़ आज दीवली है,

कैसे मैं अपनी खुशी रोकूँ, वो मुझसे मिलने आने वाली है ।

जाने क्या आज मैं कर डालूँ, वो देखकर खुश हो जाये,

उसके सारे गम मेरे हो जाएं, वो सुन्दर सपनों में खो जाये ।

उसके बारे में सोच-सोचकर, जाने क्या मैं घुनता हूँ ।

मैं स्वप्न बुनता हूँ ।

 

कुछ फ़टा है कान के नीचे शायद, झपकी टूट गयी है झन्नाटे से,

कुछ दिखता नहीं उजाले में भी, कुछ गूँज रहा सन्नाटे से ।

ये शहर नहीं है सपनों का, अरमान यहां पर जलते हैं,

माँ हो गयी है आँखों से ओझल, भावनाओं को पैर कुचलते हैं ।

चकनाचूर हो गये हैं सभी सपने, मैं खाक चुनता हूँ ।

क्यों मैं स्वप्न बुनता हूँ ?

कौन

आँसू आएँगे, उदासी आएगी या मौन आएगा;
देखता हूँ मेरे दिल, आज तुझको रुलाने कौन आएगा ? – राजेश ‘आर्य’

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