कुछ होली पर……….
माँ की सुन-सुन प्यारी बोली, संग बैठ पूरी बेलने,
बचपन की वो मेरी हमजोली, उसपे रंग उड़ेलने,
दिल में बसी वो सूरत-भोली, उसको जी-भर छेड़ने,
चली है मेरे यादों की टोली, आज होली खेलने |
माँ की सुन-सुन प्यारी बोली, संग बैठ पूरी बेलने,
बचपन की वो मेरी हमजोली, उसपे रंग उड़ेलने,
दिल में बसी वो सूरत-भोली, उसको जी-भर छेड़ने,
चली है मेरे यादों की टोली, आज होली खेलने |
भूल गया इस कदर अपने को कि,
घड़ियाँ औफ़िस में ही गुजर गई ।
साँझ हुई तो पाया,
यादें मुझे खोजने मेरे घर गई ।
मुझे अब भी याद है,
वो दिन,
जब मैं गया था पहली बार,
तुम्हारे घर |
हाँ वो तुम्हारा घर,
जो समाज के नियमों ने बनवाये थे,
‘तुम्हारे’ लिये,
‘हमारे’ घर से अलग करके |
मुझे घेरे खड़े थे,
मेरे कुछ - अनजाने -
तुम्हारे अपनों के चेहरे |
और दीदी, तुमने मेरे सामने रखे थे,
मेरे पसंदीदा ‘गोंद के लड्डू’ |
वही गोंद के लड्डू,
जिसके लिए अक्सर लड़ाईयाँ हो जाती थीं,
हमारे बीच,
और आज उन्हीं को लिये तुम………….?
मैंने पहली बार देखा -
तुम्हारा बदला स्वरूप,
जाने क्यों अजीब-सा लगा ?
डर लग रहा था,
तुम्हारी बार-बार की औपचरिकताओं से |
मेरे हाथ काँप रहे थे,
उन ‘लड्डूओं’ को खाने में,
जो भूल गये थे आज अपनी मिठास |
जी में आता था,
कि कब तुम मुझसे झगड़ो
और मैं दूर भाग जाऊँ,
दोनों हाथों में लड्डू भरकर,
ताकि मजा आ जाये तुमसे छीनकर,
उन्हें खाने में |
पर उसके बाद,
वो दिन कभी नहीं आया |
और जब समझ आई,
तो सबसे पहले समझा,
उन औपचरिकताओं के पीछे की,
तुम्हारी अब्यक्त गंभीरता को |
फ़िर अपनी मूकता को,
जो अक्षम थे तुम्हारे तिरस्कार के प्रतिकार में |
अपनी विवशता को,
जो लाचार थे, तुम्हारी पीड़ाओं को हरने में |
और अपनी सीमाओं को,
जो बाधक थे,
उन वायदों को पूरा करने में,
जो मैंने कभी किये थे तुमसे,
तुम्हारे दुलार और स्नेह के बदले |
अब तुम भले कुछ कहो-ना-कहो,
कोसो-ना-कोसो,
मैं जानता हूँ,
कि कहीं-ना-कहीं,
मैं ‘अपराधी’ हूँ इस वादे को तोड़ने के लिये |
और अब तमाम सीमाओं के बीच,
मैं बस इतना कर सकता हूँ,
कि मेरे घर आने वाली,
उस किसी की ‘बहन’ को,
दिला पाऊँ -
वो सारे अधिकार,
वो सारी खुशियाँ,
जो मैं ‘तुम्हें’ नहीं दिला पाया |
शायद यही मेरा प्रायश्चित हो,
मेरे इस ‘अपराध’ का |
ऐसा हो सकता है,
कि शायद,
तुम मुझे भूल जाओ ।
या ये भी संभव है,
कि तुम मुझे याद ही ना करना चाहो ।
और क्यों न हो-
हमारी कहानी में,
कुछ याद रखने लायक था ही नहीं ।
जो यादें तुम्हें सकुन दे सकें,
ऐसा कुछ था ही नहीं ।
और, अब -
जब तुम अपनी कहानी अलग बना रही हो
और मैं अपनी अलग
पर फिर भी,
मेरी कहानी में बार-बार तुम आ जाती हो ।
और ये जानते हुए भी,
कि शायद- तुम्हें लाकर,
मैं इस कहानी को अच्छा अन्त ना दे पाऊँ,
मैं घुमता रहता हूँ,
तुम्हारे यादों के इर्द-गिर्द ।
क्योंकि इन यादों में अनन्त गहराई है
और मुझे गहराई में जाना,
अच्छा लगता है,
शायद………।
हाँ, मैं चारपाई हूँ,
बस इसलिए नहीं कि
मुझमें चोट सहने की क्षमता है ।
बल्कि, इसलिए भी कि-
मैं मूक हूँ,
मैँ अपना दर्द बता नहीं पाता ।
इसलिए भी कि,
कोई छोड़ गया है मुझे,
ज्यादा आरामदेह बिस्तर पाकर ।
इसलिए भी कि,
मैं कोशिश करता हूँ,
हर उस को सपने दिखाने की,
जो मेरी आगोश में आता है ।
इसलिए भी कि,
आवरण के बिना,
मैं भी नग्न हूँ, कुरूप हूँ-
बिल्कुल चारपाई की तरह ।
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अभी कुछ दिनों पहले ही,
ठीक तुम्हारे जाने के बाद-
एक और आया था,
मेरे पास ।
मैंने उसे आसरा दिया,
अच्छी नींद दी,
सपने दिए अपनी आगोश में ।
और मुझे छोड़ते वक्त,
उसने मेरी ही छाती पर कूद-कूद कर,
मुझे जख्मी कर दिया,
मेरी टाँगें तोड़ दीं ।
अब खड़ा रहता हूँ,
तीन टाँग और चार ईंट के सहारे ।
और तुम,
तुम जो मेरे सबसे ज्यादा संगी रहे,
तुम जिसे अपना सबसे प्रिय मानते थे,
अपने अकेलेपन में, अपने दर्द भरे क्षण में ।
तुम, जिसकी आँसूओं को पोंछते-पोंछते
मेरा हृदय अभी तक गीला है ।
तुमने भी तो कभी तलब नहीं ली मेरी,
कभी पूछा भी नहीं मेरा हाल,
मुझसे दूर जाने के बाद ।
———————————————
अब तो सपने भी बचे नहीं,
क्या दिखाऊँ किसी को,
जो आस लेकर आए मेरी आगोश में ।
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आशा है,
कभी तो तुम लौटोगे,
एक पल के लिए ही सही,
अपने गद्देदार बिस्तर को छोड़कर ।
बस इतना ही काफ़ी होगा,
मुझमें नई उमंग, नये सपने के संचार के लिए,
जो मैं बाटूँगा,
अपने नये संगियों को ।
—————————————————-
पापा,
मैंने कभी नहीं चाहा
कि मैं आदी हो जाऊँ
जबरन प्यार पाने का ।
पर आपके लाड ने,
माँ के दुलार ने
या फ़िर,
भईया-दीदी के प्यार ने
कब मुझे ये लत लगा दी ?
पता नहीं ।
——————————————————-
पापा,
आप सबने कभी मना नहीं किया-
मुझे सबसे ज्यादा प्यार देने से ।
मैं छीनता रहा,
सबके हिस्से क प्यार
और सब छोड़ते रहे
अपने हिस्से का प्यार
मेरे लिये,
मुझे सबसे छोटा जानकर ।
कभी किसी ने रोका नहीं
मुझे मेरे ढीठपने के लिये ।
कभी किसी ने सोचा नहीं,
कि मैं आदी जाऊँगा
प्यार पाने का ।
मैं हमेशा चाहता रहा
सबसे ‘छोटा’ बनकर रहना
और आप सभी
मुझे बनाते रहे ।
——————————————————
पापा,
मैं बहुत रोया था, उस रोज
जब मैंने महसूस किया था
अपने इर्द-गिर्द देखकर
कि कोई नहीं,
जो समझ सके मेरी भावना ।
मान सके,
मुझे सबसे छोटा
और छोड़ सके
अपने हिस्से का प्यार,
मेरे लिये ।
बहुत याद आयी थी
उस रोज
आपकी, आप सबकी ।
——————————————–
पर, फ़िर आखिरकार मैंने खोज ही लिया
अपने आस-पास,
कुछ चेहरे,
जिनके सामने मैं बच्चा लग सकूँ ।
जिनसे मैं जबरन प्यार पा सकूँ,
माँग सकूँ या फ़िर छीन सकूँ ।
और मैं जान-बूझ कर करता रहा गलतियाँ,
ताकि मिल सके उनकी,
प्यार भरी डाँट ।
जान-बूझ कर छेड़ता रहा उन्हें
ताकि वो दूर ना कर दें मुझे ।
मैं बचकाना हरकतें करता रहा,
और सभी समझते भी रहे,
पर किसी ने मुझे मना नहीं किया,
किसी ने समझाया नहीं,
आप-ही की तरह ।
—————————————————
मुझे कोई मना नहीं करता,
कोई नहीं समझाता,
सभी बस अचानक छोड़ जाते हैं मुझे अकेला,
एक रोज,
अपनी आदत लगाकर ।
पर पापा,
जब भी कोई छूटता है न,
तो याद आता है मुझे,
वो मेरा घर से छूटना
और मैं,
बरबस रो पड़ता हूँ,
बिना अपनी उम्र का लिहाज किए ।
उस समय,
बहुत याद आती है आपकी,
और जी में आता है,
कि पूछूँ आपसे-
“पापा ! मुझसे क्या सौतेलापन था,
जो आपने मुझे बड़ा नहीं किया ?”
कभी इतना रोओ,
कि हँसी खिल जाए ।
कभी इतना हँसो,
कि कुछ आँसू छलक आए ।
कभी कहते रहो
और होंठ भी ना हिलें,
कभी चुप ही रहो
और हम सुनते रहें ।
कभी इतना जियो
कि जी थक जाए,
कभी इतना मरो
कि फ़िर जीने को मन ललचाए ।
कभी जाओ इतने दूर
कि हम करीब आ जाएँ,
कभी आ जाओ इतने पास
कि हम डरके भाग जाएँ ।
फ़िर चाहे वो जलते रहें
पर हम चलते रहें ।
वो दीखते रहें
और हम उनसे सीखते रहें ।
वो डराते रहें
और हम अपनी हिम्मत बढ़ाते रहें ।
——————————————-
फ़िर कभी ऐसा हो
कि तुम्हारे साथ,
ना हम हों,ना मेरी यादें
और अचानक कभी फ़िर उसे दुबारा देखकर
तुम्हें याद आ जाए मेरी
और बरबस हँसी छूट जाए
मेरी भावनाओं पर,
मेरी संवेदनाओं पर,
मेरी प्रेरणाओं पर
और मेरी बचकानी कविताओं पर ।
तो इतना करना- मेरी कविताओं के खातिर,
तुम अपनी हँसी रोकना मत
तब तक,
जबतक कि मेरी लेखनी को विश्वास न हो जाए,
मेरी सोच की सार्थकता पर
कि ये काबिल है,
कम-से-कम एक चेहरे पर हँसी खिलाने के ।