भावना
बंधन
जीवन!
अनुभवों की लंबी शृंखला,
महसूस करना किसी को
अपने हृदय में ;
देखना किसी को
स्वयं से ही जुड़ा हुआ;
सोचना किसी को
कभी यूँ ही अचानक ;
सीखना किसी से
हर पल जीने की अदा ;
लड़ना किसी से
छोटी सी बात पर ;
जताना किसी का
अधिकार मुझ पर;
डांटना किसी का
मेरी ग़लतियों पर;
करना किसी के लिए
अपने ही मन से बातें ;
ये लगाव जो तुमसे है
नया नहीं है शायद,
जन्मों का बंधन लगता है |
- दीपक(15.01.2004), मेरे जन्मदिवस पर
समय
प्यार इन आँखों से,
प्यार इन साँसों से,
प्यार इन भावनाओं से,
प्यार इन कविताओं से |
तरस इन आँखों पर,
तरस इन साँसों पर,
तरस इन भावनाओं पर,
तरस इन कविताओं पर |
नफ़रत इन आँखों से,
नफ़रत इन साँसों से,
नफ़रत इन भावनाओं से,
नफ़रत इन कविताओं से |
आँखें हैं, साँसें हैं,
भावनायें हैं, कवितायें हैं |
मैं हूँ, तुम हो,
यह समय है और जीवन है |
- वैतालिक प्रथम अंक में प्रकाशित
मैं स्वप्न बुनता हूँ
कलेजे के तवे पर रखकर, मैं अरमानों को भुनता हूँ ।
मैं स्वप्न बुनता हूँ ।
कभी यूँ ही अकेले में बैठे-बैठे, एक झपकी सी आ जाती है,
मैं गोद में सर रखकर सो जाता हूँ, माँ बालों को सहलाती है ।
दीदी आई है दौड़ी-दौड़ी, मैने उसका घरौंदा तोड़ दिया,
अबकी तो डाँट मिलेगी ही बच्चू, पहले बहुत तुम्हें छोड़ दिया ।
मैं चुप-चाप आँखें बन्द किये, उसकी शिकायतें सुनता हूँ ।
मैं स्वप्न बुनता हूँ ।
आज दिन जाने क्यों इतना खुश है, हर तरफ़ आज दीवली है,
कैसे मैं अपनी खुशी रोकूँ, वो मुझसे मिलने आने वाली है ।
जाने क्या आज मैं कर डालूँ, वो देखकर खुश हो जाये,
उसके सारे गम मेरे हो जाएं, वो सुन्दर सपनों में खो जाये ।
उसके बारे में सोच-सोचकर, जाने क्या मैं घुनता हूँ ।
मैं स्वप्न बुनता हूँ ।
कुछ फ़टा है कान के नीचे शायद, झपकी टूट गयी है झन्नाटे से,
कुछ दिखता नहीं उजाले में भी, कुछ गूँज रहा सन्नाटे से ।
ये शहर नहीं है सपनों का, अरमान यहां पर जलते हैं,
माँ हो गयी है आँखों से ओझल, भावनाओं को पैर कुचलते हैं ।
चकनाचूर हो गये हैं सभी सपने, मैं खाक चुनता हूँ ।
क्यों मैं स्वप्न बुनता हूँ ?
कौन
आँसू आएँगे, उदासी आएगी या मौन आएगा;
देखता हूँ मेरे दिल, आज तुझको रुलाने कौन आएगा ? – राजेश ‘आर्य’
मिलावट
दो बूँद आँसू,
शायद काफ़ी नहीं ज़िन्दगी के लिये,
इसलिए जरुरत पड़ती है निरन्तर,
पानी की ।
आँसू भी घुल जाते हैं,
इस पानी में,
और खोने लगते हैं अपनी सान्द्रता,
ठीक वैसे ही,
जैसे गम कम हो जाता है,
किसी से बाँटकर ।
पर किसे कोसूँ मैं,
अपनी अक्षम इन्द्रियों को
या जमाने की मिलावट को,
कि मेरी जिह्वा महसूस नहीं कर पाती,
फ़र्क पानी और आँसू में ।
और चूँकि मैं झुठला नहीं सकता,
इस यथार्थ को,
कि मैं जी नहीं सकता पानी बिना ।
इसलिए आँख मूँदकर पीता जाता हूँ,
हर घूँट पानी का,
ये मानकर कि,
पानी ही आँसू है,
आँसू ही पानी है ।
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अब ना कोई कड़्वाहट है, ना मिठास
ना रंग ना बदरंग,
ना खुशी ना गम,
क्योंकि जो कुछ भी मिलता है,
ज़िन्दगी की राह में,
वही तो पानी है,
वही तो आँसू है ।
केंचुली
केंचुली देखी है कभी,
कभी महसूस किया है उसके दर्द को ।
वो जब सर्प के आगोश में,
लिपटी हुई तन पर,
कुदती मचलती साथ उसके,
इतराती है अपने भाग्य पर ।
और फ़िर एक दिन अचानक,
सर्प निकल पड़ता है,
उसे छोड़्कर हमेशा के लिये,
किसी नयेपन की तलाश में,
और वो केंचुली,
पड़ी रोती रह्ती है कहीं,
अपनी निर्जीविता से विवश होकर ।
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मैं नहीं बनना चाहता केंचुली,
मुझे नहीं जाना किसी के आगोश में,
मुझे नहीं इतराना किसी को छूकर ।
कुछ पलों के लिये,
जिसे अपने तन से लगाया,
जिसे अपने मन से लगाया,
एक दिन वही मुझे छोड़कर,
हमेशा के लिये ……।
नहीं, नहीं,
ये दर्द असहनीय है मेरे लिये ।
मैं नहीं बनना चाहता केंचुली ।
विडंबना
कोशिश की थी मैंने,
हमेशा तुम्हारा संबल बनने की,
जब तुम्हें जरुरत थी,
एक विश्वासी सहारे की ।
पर साथ चलते-चलते,
जाने कब तुम,
मेरे से आगे निकल गयी,
कुछ पता नहीं ।
होश आया तो तब,
जब मेरे ’मैं’ ने सुना,
कि मैं अनुसरण कर रहा हूँ,
तुम्हारे पद-चिन्हों का ।
जब मुझे विभूषित किया गया,
’असफ़ल’, ’निराश’, ’कुंठित’
और न जाने किन-किन विभुतियों से ।
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और अब तो मेरे ’मैं’ ने भी स्वीकार कर लिया है,
काफ़ी अन्तर्द्वन्द्व के बाद ।
कि आगे से तुम मेरी पाथेय हो,
हमराही शायद नहीं ।
हमने शायद साथ कदम उठाये थे,
पर तुम्हारे पदचाप कहीं बहुत बड़े थे,
मेरे छोटे सपनों के हिसाब से ।
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खैर मंजिल अब भी वहीं है,
सफ़र भी वही है ।
फ़र्क पड़ा है तो बस,
हमारी स्थितियों और परिस्थितियों में ।
तुम नेतृत्व करती हो,
एक चकाचौंध से भरे सफ़ल समाज का ।
और,
मैं ’गुमनाम’ नेतृत्व करता हूँ,
उस अँधेरे का,
जो कभी शायद औरों को प्रकाशित किया करता था ।
कुछ होली पर……….
माँ की सुन-सुन प्यारी बोली, संग बैठ पूरी बेलने,
बचपन की वो मेरी हमजोली, उसपे रंग उड़ेलने,
दिल में बसी वो सूरत-भोली, उसको जी-भर छेड़ने,
चली है मेरे यादों की टोली, आज होली खेलने |
खोज
भूल गया इस कदर अपने को कि,
घड़ियाँ औफ़िस में ही गुजर गई ।
साँझ हुई तो पाया,
यादें मुझे खोजने मेरे घर गई ।